
वो कोई हैं, कुछ नहीं
आँकड़े
एक संख्या जो कल्पना से बाहर है
दुनिया भर में हर साल लगभग 83 अरब ज़मीनी जानवर और 1 से 2.7 ट्रिलियन जलीय जीव इंसानों के खाने के लिए मारे जाते हैं। हर दो सेकंड में मारे जाने वाले जानवरों की संख्या पूरी मुंबई की आबादी से ज़्यादा है।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक है — हर साल 23 करोड़ टन से ज़्यादा। इसका मतलब है करोड़ों गायें और भैंसें, जिनका हर बच्चा छीना जाता है, और जिनकी "रिटायरमेंट" का कोई इंतज़ाम नहीं — बूचड़खाने के सिवा। भारत भैंस के माँस का सबसे बड़ा निर्यातक भी है।
इतनी बड़ी संख्या के सामने हम सुन्न हो जाते हैं। लेकिन हर एक के पीछे एक चेहरा है — एक बछड़ा जो माँ की आवाज़ पहचानता था, एक मुर्गी जो हर रात एक ही कोने में सोती थी, एक भैंस जो आख़िरी पल तक अपने बच्चे को ढूँढ रही थी।

हम कहते हैं "ये बस एक मुर्गी है।" मतलब होता है: कृपया हमें मत दिखाओ।
संवेदना
वे दर्द महसूस करते हैं — और यह हम बहुत पहले से जानते हैं
2012 में दुनिया के बड़े न्यूरोसाइंटिस्ट्स ने Cambridge Declaration on Consciousness पर साइन किया — आधिकारिक तौर पर ये माना कि सभी स्तनधारी, सभी पक्षी, और ऑक्टोपस जैसे कई जीव चेतन हैं। उनकी एक अंदरूनी ज़िंदगी है।
सूअर शीशे में ख़ुद को पहचान सकते हैं — 3 साल के बच्चे से ज़्यादा problem-solving कर सकते हैं। मुर्गी अपने चूज़े का दर्द देखकर परेशान होती है। गाय अपने झुंड में दोस्तियाँ बनाती है और बिछड़ने पर शोक मनाती है। मछलियाँ औज़ार इस्तेमाल करती हैं और एक-दूसरे से सीखती हैं।
हमारे ग्रंथों ने यही सदियों पहले कहा — "अहिंसा परमो धर्मः"। फ़र्क बस यह है कि अब हमारे पास उसी बात का वैज्ञानिक प्रमाण भी है।


“अहिंसा एक नीति नहीं, एक जीवन-शैली है। और सबसे कमज़ोर के साथ हम जो करते हैं, वही हमारी सभ्यता का असली पैमाना है।”
अंदर की तस्वीर
‘स्टैंडर्ड प्रैक्टिस’ असल में क्या है
नीचे की वीडियो किसी छुपे हुए, ग़ैर-क़ानूनी फ़ार्म की नहीं हैं — ये पश्चिमी देशों के लाइसेंस-प्राप्त, "उच्च गुणवत्ता" वाले फ़ार्म्स की सामान्य प्रथा है। भारत में हालात अक्सर इससे भी बदतर होते हैं क्योंकि कोई पशु कल्याण क़ानून ठीक से लागू नहीं होता।


तीन क्रूरताएँ
औद्योगिक खेती एक जीव के शरीर के साथ क्या करती है

बंधन
एक अंडे देने वाली मुर्गी पूरी ज़िंदगी एक A4 काग़ज़ से छोटी जगह में बिताती है। एक ब्रीडिंग सूअरनी ऐसे खाँचे में सालों रहती है जहाँ वो मुड़ भी नहीं सकती।
बिना दर्दनिवारक के विकृति
चूज़ों की चोंच काटना, बछड़ों के सींग दागना, मेमनों का बधियाकरण — यह सब बिना एनेस्थीसिया के नन्हे जीवों पर अरबों की संख्या में किया जाता है।
जेनेटिक विकृति
आज की ब्रॉयलर मुर्गी 35 दिन में स्लॉटर वेट तक पहुँचती है — 50 साल पहले से 3 गुना तेज़। डेयरी की गाय आज प्रकृति से 10 गुना ज़्यादा दूध देती है। हमने उनके शरीर को उनके ही ख़िलाफ़ बना दिया।
ये कुछ भी ग़ैर-क़ानूनी नहीं है। ये सब "नॉर्मल" है। फ़ैक्ट्री फ़ार्मिंग का सबसे डरावना पहलू यह नहीं कि वो नियम तोड़ती है — डरावना यह है कि नियम ही उसी के हिसाब से बनाए गए हैं।

वो कौन हैं
आँकड़ों के पीछे कौन है


मुर्गियाँ
इस समय धरती पर लगभग 25 अरब मुर्गियाँ ज़िंदा हैं — इंसानों से तीन गुना। ज़्यादातर कभी सूरज नहीं देखतीं। भारत में पोल्ट्री उद्योग हर साल 90 करोड़ से ज़्यादा मुर्गियाँ मारता है।
गाय और भैंसें
डेयरी की हर गाय या भैंस हर साल जबरदस्ती गाभिन की जाती है। बछड़ा जन्म के घंटों में अलग। दूध बंद होते ही बूचड़खाने। भारत भैंस माँस का सबसे बड़ा निर्यातक है।
सूअर
दुनिया में हर साल 1.4 अरब सूअर मारे जाते हैं — धरती के सबसे बुद्धिमान जीवों में से। शीशे में ख़ुद को पहचानते हैं, सपने देखते हैं, दोस्तियाँ बनाते हैं। 6 महीने में मार दिए जाते हैं।
बत्तख़ और बकरे
ईद के लिए बकरे, बिरयानी के लिए बत्तख़ — सबकी ज़िंदगी कुछ महीने ही होती है, ज़्यादातर अंधेरे, गंदे शेड में।
भेड़-बकरियाँ
मेमने 4-12 महीने में मारे जाते हैं। ऊन के लिए म्यूलज़िंग जैसी क्रूर प्रथाएँ अभी भी जारी हैं।
जलीय जीव
मछलियाँ जाल में अपने ही वज़न से कुचली जाती हैं, डेक पर दम घुटने से मरती हैं। उनकी हत्या का कोई नियम कहीं नहीं।



समुद्र
दुनिया का सबसे बड़ा छिपा हुआ बूचड़खाना
हर साल इंसानी खाने के लिए 1 से 3 ट्रिलियन मछलियाँ मारी जाती हैं — संख्या इतनी बड़ी कि हम मछलियाँ गिनते नहीं, वज़न में तौलते हैं।
FAO के अनुसार दुनिया की एक-तिहाई से ज़्यादा मछली प्रजातियाँ ओवरफ़िशिंग का शिकार हैं। हर 1 किलो झींगा पकड़ने में 20 किलो "bycatch" मारी जाती है — कछुए, डॉल्फ़िन, शार्क — और वापस समुद्र में फेंक दी जाती है।

समुद्र की हालत
आम सवाल
जो आप पूछना चाहेंगे
हमारे यहाँ तो गाय को माँ कहते हैं — फिर डेयरी में दिक्कत क्या है?
देसी गाय की बात अलग है ना?
मछली को दर्द नहीं होता ना? वो तो 'सात्विक' मानी जाती है कई जगह।
अगर सब वेजन हो गए तो इतने जानवरों का क्या होगा?
हमारी संस्कृति में तो हज़ारों साल से शाकाहार है — फिर अलग से क्यों सोचें?
अंडा तो शाकाहारी है ना — उसमें जान नहीं होती?
शुरुआत
आज एक ज़िंदगी कम इस सिस्टम में जाने दें
आपको परफ़ेक्ट होने की ज़रूरत नहीं है। बस आज की एक थाली — एक ऐसे जीव की क़ीमत पर न हो जिसने कभी आज़ाद हवा नहीं ली। यही सबसे सीधा "मैं इसमें शामिल नहीं हूँ" कहने का तरीक़ा है।
डॉक्यूमेंट्री
देखें: इंडस्ट्री के अंदर की असली तस्वीरें
पॉल मैक्कार्टनी की आवाज़ में 'If Slaughterhouses Had Glass Walls', और फ़्रंटलाइन इंवेस्टिगेशन से रिकॉर्डिंग।
Source: PETA
Source: Mercy For Animals
क़ानूनी मान्यता
भारत और दुनिया
भारत के संविधान का Article 51A(g) — हर नागरिक का मौलिक कर्तव्य है सजीव प्राणियों के प्रति करुणा।
उत्तराखंड HC (2018), पंजाब-हरियाणा HC (2019) — पशुओं को 'क़ानूनी व्यक्ति' का दर्जा।
न्यूज़ीलैंड, स्पेन, फ़्रांस — पशुओं को 'संवेदी प्राणी' के रूप में क़ानूनी मान्यता।
बचाव अभयारण्य
जहाँ कहानी बदलती है
भारत में Sanctuary for Health and Reconnection to Animals and Nature (SHARAN), Animal Aid Unlimited (उदयपुर) — बचाए गए पशुओं के लिए जीवन।
वहाँ जाएँ। एक गाय, सूअर, या मुर्ग़ी के साथ एक घंटा बिताने से सब कुछ बदल जाता है।