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One Fork

पशुओं के लिए

वो कोई हैं, कुछ नहीं

पैकेट पर छपी हँसती हुई गाय असली नहीं है। असली गाय थकी हुई है, उसका बछड़ा छीन लिया गया है, और उसका शरीर एक मशीन बना दिया गया है। उनकी कहानी सुनी जानी चाहिए।

आँकड़े

एक संख्या जो कल्पना से बाहर है

दुनिया भर में हर साल लगभग 83 अरब ज़मीनी जानवर और 1 से 2.7 ट्रिलियन जलीय जीव इंसानों के खाने के लिए मारे जाते हैं। हर दो सेकंड में मारे जाने वाले जानवरों की संख्या पूरी मुंबई की आबादी से ज़्यादा है।

भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक है — हर साल 23 करोड़ टन से ज़्यादा। इसका मतलब है करोड़ों गायें और भैंसें, जिनका हर बच्चा छीना जाता है, और जिनकी "रिटायरमेंट" का कोई इंतज़ाम नहीं — बूचड़खाने के सिवा। भारत भैंस के माँस का सबसे बड़ा निर्यातक भी है।

इतनी बड़ी संख्या के सामने हम सुन्न हो जाते हैं। लेकिन हर एक के पीछे एक चेहरा है — एक बछड़ा जो माँ की आवाज़ पहचानता था, एक मुर्गी जो हर रात एक ही कोने में सोती थी, एक भैंस जो आख़िरी पल तक अपने बच्चे को ढूँढ रही थी।

एक डेयरी गाय का कैमरे की ओर देखता हुआ क्लोज़-अप
हर गिलास दूध के पीछे, एक माँ। फोटो: cruelty.farm
0 अरब
हर साल मारे गए ज़मीनी जानवर (FAO, 2022)
0 करोड़ टन
भारत का सालाना दूध उत्पादन — दुनिया में #1
0%
फ़ैक्ट्री फ़ार्म में पले-बढ़े पोल्ट्री बर्ड्स
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मछलियों के वध के लिए कोई कल्याणकारी नियम नहीं — कहीं भी
हम कहते हैं "ये बस एक मुर्गी है।" मतलब होता है: कृपया हमें मत दिखाओ।

संवेदना

वे दर्द महसूस करते हैं — और यह हम बहुत पहले से जानते हैं

2012 में दुनिया के बड़े न्यूरोसाइंटिस्ट्स ने Cambridge Declaration on Consciousness पर साइन किया — आधिकारिक तौर पर ये माना कि सभी स्तनधारी, सभी पक्षी, और ऑक्टोपस जैसे कई जीव चेतन हैं। उनकी एक अंदरूनी ज़िंदगी है।

सूअर शीशे में ख़ुद को पहचान सकते हैं — 3 साल के बच्चे से ज़्यादा problem-solving कर सकते हैं। मुर्गी अपने चूज़े का दर्द देखकर परेशान होती है। गाय अपने झुंड में दोस्तियाँ बनाती है और बिछड़ने पर शोक मनाती है। मछलियाँ औज़ार इस्तेमाल करती हैं और एक-दूसरे से सीखती हैं।

हमारे ग्रंथों ने यही सदियों पहले कहा — "अहिंसा परमो धर्मः"। फ़र्क बस यह है कि अब हमारे पास उसी बात का वैज्ञानिक प्रमाण भी है।

एक माँ गाय अपने नवजात बछड़े को प्यार से चूमती हुई
एक माँ और उसका बछड़ा। फोटो: PETA
एक औद्योगिक डेयरी संचालन के अंदर
डेयरी उद्योग के अंदर। फोटो: cruelty.farm
“अहिंसा एक नीति नहीं, एक जीवन-शैली है। और सबसे कमज़ोर के साथ हम जो करते हैं, वही हमारी सभ्यता का असली पैमाना है।”
महात्मा गांधी

अंदर की तस्वीर

‘स्टैंडर्ड प्रैक्टिस’ असल में क्या है

नीचे की वीडियो किसी छुपे हुए, ग़ैर-क़ानूनी फ़ार्म की नहीं हैं — ये पश्चिमी देशों के लाइसेंस-प्राप्त, "उच्च गुणवत्ता" वाले फ़ार्म्स की सामान्य प्रथा है। भारत में हालात अक्सर इससे भी बदतर होते हैं क्योंकि कोई पशु कल्याण क़ानून ठीक से लागू नहीं होता।

हरे चरागाह में एक गाय और उसका बछड़ा
जीवन भर का बंधन — जब तक डेयरी उद्योग उन्हें अलग नहीं करता। फोटो: PETA
औद्योगिक मांस उत्पादन में बंद सूअर
मांस उद्योग, जैसा वास्तव में दिखता है। फोटो: cruelty.farm
ब्रॉयलर मुर्गियों का शेड — इन्हें इतनी तेज़ी से बढ़ने के लिए तैयार किया गया है कि इनकी टाँगें शरीर का बोझ नहीं उठा पातीं।
गर्भवती सूअरनी इतनी तंग जगह में बंद कि वो मुड़ भी नहीं सकती।
मेमने — कुछ ही हफ़्तों के बच्चे — माँस के लिए।
जेनेटिक हेरफेर: शरीर इतनी तेज़ी से बढ़ता है कि अंग साथ नहीं दे पाते।

तीन क्रूरताएँ

औद्योगिक खेती एक जीव के शरीर के साथ क्या करती है

समुद्र में औद्योगिक जाल पिंजरों में पाले गए सैल्मन
खुले-जाल सैल्मन जलीय कृषि। फोटो: Wikimedia Commons (CC BY 3.0)

बंधन

एक अंडे देने वाली मुर्गी पूरी ज़िंदगी एक A4 काग़ज़ से छोटी जगह में बिताती है। एक ब्रीडिंग सूअरनी ऐसे खाँचे में सालों रहती है जहाँ वो मुड़ भी नहीं सकती।

बिना दर्दनिवारक के विकृति

चूज़ों की चोंच काटना, बछड़ों के सींग दागना, मेमनों का बधियाकरण — यह सब बिना एनेस्थीसिया के नन्हे जीवों पर अरबों की संख्या में किया जाता है।

जेनेटिक विकृति

आज की ब्रॉयलर मुर्गी 35 दिन में स्लॉटर वेट तक पहुँचती है — 50 साल पहले से 3 गुना तेज़। डेयरी की गाय आज प्रकृति से 10 गुना ज़्यादा दूध देती है। हमने उनके शरीर को उनके ही ख़िलाफ़ बना दिया।

ये कुछ भी ग़ैर-क़ानूनी नहीं है। ये सब "नॉर्मल" है। फ़ैक्ट्री फ़ार्मिंग का सबसे डरावना पहलू यह नहीं कि वो नियम तोड़ती है — डरावना यह है कि नियम ही उसी के हिसाब से बनाए गए हैं।

एक फीडलॉट में ठूंसे गए गोमांस मवेशी
मवेशी फीडलॉट, न्यू मैक्सिको। फोटो: USDA / Wikimedia (Public Domain)

वो कौन हैं

आँकड़ों के पीछे कौन है

अपने बत्तख के बच्चे के साथ तैरती माँ मैलार्ड
एक माँ मैलार्ड और उसका बत्तख का बच्चा। फोटो: PETA
एक औद्योगिक शेड के अंदर भीड़भाड़ वाली टर्की
बटरबॉल टर्की शेड के अंदर जांच, उत्तरी कैरोलिना। फोटो: Mercy For Animals / Wikimedia (CC BY 2.0)

मुर्गियाँ

इस समय धरती पर लगभग 25 अरब मुर्गियाँ ज़िंदा हैं — इंसानों से तीन गुना। ज़्यादातर कभी सूरज नहीं देखतीं। भारत में पोल्ट्री उद्योग हर साल 90 करोड़ से ज़्यादा मुर्गियाँ मारता है।

गाय और भैंसें

डेयरी की हर गाय या भैंस हर साल जबरदस्ती गाभिन की जाती है। बछड़ा जन्म के घंटों में अलग। दूध बंद होते ही बूचड़खाने। भारत भैंस माँस का सबसे बड़ा निर्यातक है।

सूअर

दुनिया में हर साल 1.4 अरब सूअर मारे जाते हैं — धरती के सबसे बुद्धिमान जीवों में से। शीशे में ख़ुद को पहचानते हैं, सपने देखते हैं, दोस्तियाँ बनाते हैं। 6 महीने में मार दिए जाते हैं।

बत्तख़ और बकरे

ईद के लिए बकरे, बिरयानी के लिए बत्तख़ — सबकी ज़िंदगी कुछ महीने ही होती है, ज़्यादातर अंधेरे, गंदे शेड में।

भेड़-बकरियाँ

मेमने 4-12 महीने में मारे जाते हैं। ऊन के लिए म्यूलज़िंग जैसी क्रूर प्रथाएँ अभी भी जारी हैं।

जलीय जीव

मछलियाँ जाल में अपने ही वज़न से कुचली जाती हैं, डेक पर दम घुटने से मरती हैं। उनकी हत्या का कोई नियम कहीं नहीं।

दो छोटे सूअर एक-दूसरे से चिपके सोते हुए
सूअर के बच्चे भी पिल्लों की तरह एक-दूसरे से चिपककर सोते हैं।
पशुपालन के लिए कटे जंगल
मवेशियों के चारे के लिए काटे गए जंगल — इसका हर्जाना कभी रेस्तराँ के बिल में नहीं जुड़ता।
रंग-बिरंगा पौध-आधारित खाना
क्रूरता के बिना थाली में यह सब है।

समुद्र

दुनिया का सबसे बड़ा छिपा हुआ बूचड़खाना

हर साल इंसानी खाने के लिए 1 से 3 ट्रिलियन मछलियाँ मारी जाती हैं — संख्या इतनी बड़ी कि हम मछलियाँ गिनते नहीं, वज़न में तौलते हैं।

FAO के अनुसार दुनिया की एक-तिहाई से ज़्यादा मछली प्रजातियाँ ओवरफ़िशिंग का शिकार हैं। हर 1 किलो झींगा पकड़ने में 20 किलो "bycatch" मारी जाती है — कछुए, डॉल्फ़िन, शार्क — और वापस समुद्र में फेंक दी जाती है।

एक अभयारण्य में बचाए गए जानवर
एक वास्तविक अभयारण्य कैसा दिखता है। फोटो: cruelty.farm

समुद्र की हालत

अत्यधिक मछली पकड़ने से प्रभावित मछली प्रजातियाँ38%
झींगा ट्रॉल में उप-पकड़ (वज़न के प्रतिशत के रूप में)90%
1950 से बड़ी शिकारी मछलियों की संख्या में गिरावट90%
समुद्र के डेड ज़ोन (खेती के रन-ऑफ से)75%

आम सवाल

जो आप पूछना चाहेंगे

एक धूप से भरे जंगल के साफ़ स्थान में खड़ा गधा
हर जानवर का अपना एक जीवन होता है।
हमारे यहाँ तो गाय को माँ कहते हैं — फिर डेयरी में दिक्कत क्या है?
श्रद्धा और व्यवहार में फ़र्क है। आज भारत की डेयरी इंडस्ट्री में गाय और भैंस को बार-बार ज़बरदस्ती गाभिन कराया जाता है, बछड़े को जन्म के कुछ घंटों में अलग कर दिया जाता है (ताकि उसका दूध बेचा जा सके), और दूध देना बंद होते ही उसे बूचड़खाने भेज दिया जाता है। 'गौमाता' की पूजा और 'गौमाता' का शोषण — दोनों एक साथ चल रहे हैं।
देसी गाय की बात अलग है ना?
देसी हो या जर्सी — दूध देने के लिए हर साल बच्चा पैदा करना ज़रूरी है, हर बच्चे को माँ से अलग करना ज़रूरी है, और कोई गाय हमेशा दूध नहीं देती। आख़िर में सबको वही रास्ता दिखाया जाता है।
मछली को दर्द नहीं होता ना? वो तो 'सात्विक' मानी जाती है कई जगह।
मछली को दर्द होता है — यह न्यूरोसाइंस ने साबित किया है। उनमें pain receptors हैं, opioid receptors हैं, और उनका व्यवहार दर्द में बदलता है। 'सात्विक' एक सांस्कृतिक लेबल है, जीवविज्ञान नहीं।
अगर सब वेजन हो गए तो इतने जानवरों का क्या होगा?
मांग से ही ब्रीडिंग होती है। 99% फ़ार्म के जानवर मौजूद ही इसलिए हैं क्योंकि उन्हें artificial insemination से पैदा किया जाता है ताकि मारा जा सके। मांग घटेगी तो ब्रीडिंग घटेगी — सड़कों पर अरबों मुर्गियाँ नहीं घूमेंगी, बस इतने पैदा ही नहीं होंगे।
हमारी संस्कृति में तो हज़ारों साल से शाकाहार है — फिर अलग से क्यों सोचें?
बिल्कुल — और यही ताक़त है। भारत के पास दुनिया की सबसे पुरानी प्लांट-बेस्ड परंपरा है: दाल-चावल, राजमा, छोले, सब्ज़ी, रोटी। बस डेयरी और अंडे को भी उसी करुणा के दायरे में लाना है, जिसे हमारे ग्रंथों ने हमेशा 'अहिंसा' कहा।
अंडा तो शाकाहारी है ना — उसमें जान नहीं होती?
अंडे की इंडस्ट्री में नर चूज़ों को जन्म के पहले दिन ही पीसकर मार दिया जाता है (क्योंकि वो अंडा नहीं देते)। मादा मुर्गियाँ 18 महीने तक एक A4 साइज़ के पिंजरे में रखी जाती हैं। 'जान नहीं' एक मार्केटिंग लाइन है।

शुरुआत

आज एक ज़िंदगी कम इस सिस्टम में जाने दें

आपको परफ़ेक्ट होने की ज़रूरत नहीं है। बस आज की एक थाली — एक ऐसे जीव की क़ीमत पर न हो जिसने कभी आज़ाद हवा नहीं ली। यही सबसे सीधा "मैं इसमें शामिल नहीं हूँ" कहने का तरीक़ा है।

डॉक्यूमेंट्री

देखें: इंडस्ट्री के अंदर की असली तस्वीरें

पॉल मैक्कार्टनी की आवाज़ में 'If Slaughterhouses Had Glass Walls', और फ़्रंटलाइन इंवेस्टिगेशन से रिकॉर्डिंग।

Glass Walls — narrated by Paul McCartney

Source: PETA

Extreme Meat: Animals Suffer at a Nebraska Feedlot

Source: Mercy For Animals

क़ानूनी मान्यता

भारत और दुनिया

भारत के संविधान का Article 51A(g) — हर नागरिक का मौलिक कर्तव्य है सजीव प्राणियों के प्रति करुणा।

उत्तराखंड HC (2018), पंजाब-हरियाणा HC (2019) — पशुओं को 'क़ानूनी व्यक्ति' का दर्जा।

न्यूज़ीलैंड, स्पेन, फ़्रांस — पशुओं को 'संवेदी प्राणी' के रूप में क़ानूनी मान्यता।

बचाव अभयारण्य

जहाँ कहानी बदलती है

भारत में Sanctuary for Health and Reconnection to Animals and Nature (SHARAN), Animal Aid Unlimited (उदयपुर) — बचाए गए पशुओं के लिए जीवन।

वहाँ जाएँ। एक गाय, सूअर, या मुर्ग़ी के साथ एक घंटा बिताने से सब कुछ बदल जाता है।

मुख्य निष्कर्ष

चेतना एक स्थापित वैज्ञानिक तथ्य है

कैम्ब्रिज घोषणा पत्र (2012) ने पुष्टि की कि स्तनधारी, पक्षी और ऑक्टोपस में चेतन अनुभव के तंत्रिकीय आधार मौजूद हैं। अब यह बहस नहीं है कि वे महसूस करते हैं या नहीं।

क्रूरता कानूनी है, असाधारण नहीं

गुप्त फुटेज में जो चीजें लोगों को चौंकाती हैं, उनमें से अधिकांश मानक, कानूनी प्रथाएँ हैं: गर्भावस्था के पिंजरे, बैटरी-शैली के पिंजरे, चोंच काटना, बधियाकरण और बिना एनेस्थीसिया के पूंछ काटना।

मछलियाँ सबसे बड़ा लेखा-जोखा हैं

हर साल 1 से 2 ट्रिलियन जलीय जानवर मारे जाते हैं। किसी भी देश में उनके लिए सार्थक वध कल्याण कानून नहीं हैं।

मांग प्रजनन को संचालित करती है

पशुधन इसलिए मौजूद है क्योंकि उन्हें अस्तित्व में लाने का आदेश दिया जाता है। गिरती मांग का मतलब है कम पशुओं का प्रजनन, न कि अरबों को छोड़ना — परिवर्तन ऊपरी स्तर पर होता है।

स्रोत और आगे पढ़ना

  • Cambridge Declaration on Consciousness (2012) — कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रमुख तंत्रिका वैज्ञानिकों द्वारा हस्ताक्षरित
  • FAO Statistical Yearbook (FAOSTAT) — वैश्विक वध और उत्पादन के आंकड़े
  • Mood & Brooke, fishcount.org.uk — जंगली पकड़ी गई और खेतों में पाली गई मछलियों की संख्या का अनुमान
  • EFSA welfare opinions on pigs, laying hens and broilers — मानक पशुपालन प्रथाओं पर यूरोपीय संघ के वैज्ञानिक मूल्यांकन
  • Marino & Colvin, Int. Journal of Comparative Psychology — घरेलू सूअरों में संज्ञान और भावना